मैक्सिम गोर्की के उपन्यास ‘मां’ में एक वृद्ध महिला जो विद्रोह का नेतृत्व करती है और उसे ‘मां’ कहा गया है, वह बोलती है – ‘जो हमारी आज हालत है, इससे बुरा क्या हो सकता है!’ इसलिए डर किस बात का है, खुलकर सामने आओ और अत्याचारी शासन के विरुद्ध विद्रोह करो! जब तक शासन व्यवस्था के प्रति प्रेम होता है, तब तक नागरिक यह ध्यान रखता है कि उसके किसी काम से व्यवस्था में बाधा उत्पन्न न हो, लेकिन जब व्यवस्था में आस्था नहीं रही, तब कैसा और प्रेम और जब प्रेम नहीं तो कैसा भय!

सबसे बडा भय इंसान को प्रेम में रहते हुए यही होता कि प्रेम नाम की इस मूल्यवान संपदा को कहीं मैं खो न दूं, परंतु जब प्रेम ही नहीं रहता तब इंसान निर्भीक होकर कह सकता है कि ‘मैं किसी से नहीं डरता” क्योंकि जो कुछ खो जाने का सबसे अधिक भय होता है, वह तो अपने पास है ही नहीं!
सैनिकों को सीमा पर अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए भी इसी आधार पर प्रेरित किया जाता है कि वे राष्ट्रमाता के लिए लड़ रहे हैं। इस प्रकार प्रेम के लिए लोग अपने प्राण न्यौछावर कर सकते हैं और जहाँ प्रेम नहीं है, उनको किसी प्रकार की चिंता नहीं है, उनको न किसी के लिए प्राण देने की बात सोचनी होगी और न किसी से डरना होगा, वे पूरी तरह आत्ममुग्ध होकर जीते रह सकते हैं और हर मामले में बेफिक्र होकर टिप्पणी कर सकते हैं, क्योंकि उनको किसी का पक्षधर होने की भी आवश्यकता नहीं है। जो प्रेम करते हैं वे ही वास्तव में ईश्वर से भी प्रेम कर सकते है, अगर प्रेम करना स्वभाव में नहीं है तो ईश्वर के प्रति भी आप कर्मकांड ही कर सकते हैं।
एक और प्रवृत्ति उन लोगों में विकसित हो जाती है, जो प्रेम से दूर हो जाते हैं। कोई पूरा जीवन तो प्रेम से दूर नहीं रह सकता, आपने कभी तो प्रेम किया ही होगा, प्रेम किया होगा तो पाया भी होगा। ऐसे में व्यक्ति उन लोगों को याद करता है जिनसे आपको प्रेम रहा है और वे अब साथ नहीं हैं, जो अब भी साथ हैं उनसे तो आप प्रेम नहीं कर पाएंगे, क्योंकि आपका अब प्रेम करने का स्वभाव नहीं रहा। जो दूर हैं और उनसे दैनिक व्यवहार नहीं रहता, उनसे आप भरपूर प्रेम कर सकते हैं क्योंकि वह अधिकांशतः वर्चुअल ही होगा, आपको उनसे दैनिक व्यवहार नहीं करना होगा। आप सोशल साइट्स पर अच्छी अच्छी बातें लिख सकते हैं और उधर से भी आपको ऐसी ही प्रतिक्रिया मिल जाएंगी।
लेकिन इंसान को रहना तो वर्तमान में ही होता है और रहना भी चाहिए। मुझे जब अपना सेवाकाल याद आता है तो ऐसे अनेक अविस्मरणीय प्रसंग याद आते हैं जब मैंने महानतम कवियों, कलाकारों के साथ समय बिताया है, भव्य आयोजन कराए हैं। मुझे याद आता है कि टाउनशिप परिवार में मेरे असंख्य चाहने वाले थे, जिधर से मैं निकलता था लोग घेर लेते थे, उनमें अधिकारी, कर्मचारी, स्कूलों के प्रिंसिपल, शिक्षक, दुकानदार आदि कौन नहीं था।
लेकिन वो सब अतीत की बात थी, अब उनमें से कोई साथ नहीं है, जो सहकर्मी बहुत निकट थे उनमें से अधिकतर ऊपर जा चुके हैं या बहुत दूर हैं, और हमें जीना तो वर्तमान में ही है!

स्वर्गीय किशन सरोज जी की पंक्तियां याद आ रही हैं-
भावुकता के कैसे केश संवारे जाएं, कैसे इन घडियों के चित्र उतारे जाएं,
लगता है मन की आकुलता का अर्थ यही, आगत के आगे हम
हाथ पसारे जाएं।
वह देखो कुहरे में चंदन वन डूब गया।
क्योंकि पुराना सब कुछ कभी खत्म हो जाता है, और जीना तो हमें वर्तमान में ही चाहिए न!
नदिया चले, चले रे धारा,
चंदा चले, चले रे तारा,
तुझको चलना होगा!
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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