आज कवि सम्मेलनों से संबंधित एक- दो प्रसंग याद आ रहे हैं। शुरू में जब दिल्ली में रहता था तब कवि गोष्ठियों में तो जाना होता ही था, वहीं प्रसिद्ध मंचीय कवियों से शोभित आयोजन भी देखने-सुनने का अवसर मिलता था। जैसे लाल किले का कवि सम्मेलन, जिसके कर्ता-धर्ता उस समय गोपाल प्रसाद व्यास होते थे और संतोषानंद जी को जब वो पुकारते थे तो संतोषानंद ‘गुरुदेव’ कहते हुए उनके चरणों में लेट जाते थे। लाल किले पर ही हमने ऐसे आयोजन भी देखे हैं जिनकी अध्यक्षता दिनकर जी करते थे और वो पूरी रात चलते थे और ऐसे ही एक आयोजन में बालकवि बैरागी जी ने यह पंक्ति भी कही थी- ‘दिनकर का आशीष संग ले, हम दिन कर देंगे’।

खैर आज मैं यह बात किसी और प्रसंग की कर रहा हूँ। इन आयोजनों में ही मैंने कभी एक कवि ‘सबरस’ जी को भी सुना था, जो हास्य विधा में दुमदार दोहे लिखते थे। मतलब दोहे के बाद एक वाक्यांश पूंछ के रूप में लगा दिया जाए। जैसे-
अपने देश में जो मरे, स्वर्गवासी कहलाए,
फिर विधि ने बेकार क्यों नर्क दिया बनवाय,
वहाँ क्या भैंस बंधेंगी!
वैसे यह पंक्तियां सुनने के बाद मुझे यह खयाल आया कि अगर भैंसों के पास कोई अच्छा वकील होता तो वे कवि पर मानहानि का मुकदमा कर देतीं और इस बहाने किसी खाली बैठे वकील को भी काम मिल जाता।
एक और दुमदार दोहा याद आ रहा है सबरस जी का-
सास बहू में ठन गई, लड़ते बीती रात,
बढ़ते- बढ़ते बढ़ गई, सिर्फ ज़रा सी बात
खटोला यहीं बिछेगा।
खैर वो कवि शायद मेरठ या मुज़फ्फरनगर के थे, उस समय उनके दुमदार दोहे काफी लोकप्रिय हुए और इस बहाने हास्य कवि हुल्लड मुरादाबादी ने भी बहती गंगा में हाथ धोने के लिए इनके कुछ जवाबी दोहे लिखे, अब सबरस जी को तो इतने कवि सम्मेलन मिलते नहीं थे, सो हुल्लड जी कवि सम्मेलनों में पहले सबरस जी का दोहा सुनाते थे और फिर उसके जवाब में अपना लिखा हुआ दोहा सुनाते थे। वैसे भी साहित्यिक मर्यादा का निर्वाह करते हुए लिखी गई कविता जनता में उतनी लोकप्रिय नहीं हो पाती, जितनी मर्यादा भूलकर लिखी गई कविता होती है।
अभी बस एक ही दुमदार दोहा उत्तर सहित याद आ रहा है, वही यहाँ लिख देता हूँ-
सबरस-
पूंजीपतियों-पत्नियों ले लो मुझको गोद,
मुझको भी हो जाएगा, लक्ष्मी जी का बोध,
तिजोरी में रह लूंगा।
हुल्लड-
पूंजीपतियों-पत्नियों मत लो इसको गोद,
यदि इसको हो जाएगा, लक्ष्मी जी का बोध,
तिजोरी ले भागेगा।
इसके अलावा एक और प्रसंग याद आ रहा है, यह शायद रामावतार त्यागी जी की गीत पंक्तियां थीं-
जितने गीत लिखे हैं मैंने, इस लंबी बीमार उमर में,
उन सबको बेचूं तो शायद, आधा कफन मुझे मिल पाए।
इसकी प्रतिक्रिया में शायद शिशुपाल निर्धन जी ने अपने गीत में ये पंक्तियां कही थीं-
मैं हूँ खरीदार गीतों का, ठहरो गीत बेचने वाले,
गंगाजली उठाकर कह दो,
तुमने कितने गीत लिखे हैं!
ऐसे ही कवि सम्मेलनों के प्रसंग में ये सब याद आ गया, सो आज ये ही लिख दिया।
आज के लिए इतना ही, नमस्कार।
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