राह पर देखेगा कौन!

मैं ही अपना मोहतसिब बन जाऊँ वर्ना दोस्तो,
गुमरह-ए-मंज़िल हूँ या हूँ राह पर देखेगा कौन|

मंज़र भोपाली

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