गर ज़बाँ मिट जाएगी!

‘मंज़र’ अपने ख़ून से इस शाख़ को सरसब्ज़ कर,
गर ज़बाँ मिट जाएगी तेरा हुनर देखेगा कौन|

मंज़र भोपाली

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