कभी पत्थर के दिल!

कभी पत्थर के दिल ऐ ‘कैफ़’ पिघले हैं न पिघलेंगे,
मुनाजातों से फ़रियादों से चीख़ों से पुकारों से|

कैफ़ भोपाली

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