हसीनों से रक़ीबों से!

तन-ए-तन्हा मुक़ाबिल हो रहा हूँ मैं हज़ारों से,
हसीनों से रक़ीबों से ग़मों से ग़म-गुसारों से|

कैफ़ भोपाली

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