यूँ न ज़ुल्फ़ों को अपनी!

ऐसा बनना सँवरना मुबारक तुम्हें कम से कम इतना कहना हमारा करो,
चाँद शरमाएगा चाँदनी रात में यूँ न ज़ुल्फ़ों को अपनी सँवारा करो|

फ़ना निज़ामी कानपुरी

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