ऐ दश्ते-जुनूं तेरे!

ऐ दश्ते-जुनूं तेरे सूखे हुए काँटों पर,
हमने तो लहू छिड़का, दुनिया ने कहा पानी।

सूर्यभानु गुप्त

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