बस यही अपराध !

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि तथा फिल्मों के लिए अनेक अमर गीत लिखने वाले पद्मश्री गोपाल दास नीरज जी का एक फिल्मी गीत शेयर कर रहा हूँ। यह गीत मेरे प्रिय गायक मुकेश जी ने गाया था और फिल्म- पहचान के लिए इस गीत का संगीत शंकर जयकिशन जी ने दिया था।

नीरज जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय गोपाल दास नीरज का यह गीत –


बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ


एक खिलौना बन गया दुनिया के मेले में
कोई खेले भीड में कोई अकेले में
मस्कुराकर भेंट हर स्वीकार करता हूँ

हूँ बहुत नादान करता हूँ ये नादानी
बेचकर खुशियाँ खरीदूँ आँख का पानी
हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ

मैं बसाना चाहता हूँ स्वर्ग धरती पर
आदमी जिसमें रहे बस आदमी बनकर
उस नगर की हर गली तैयार करता हूँ


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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