आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।
शमशेर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयरकी हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की यह कविता –

दिल, मेरी कायनात अकेली है—और मैं !
बस अब ख़ुदा की जात अकेली है, और मैं !
तुम झूठ और सपने का रंगीन फ़र्क थे :
तुम क्या, ये एक बात है, और मैं !
सब पार उतर गए हैं, अकेला किनारा है :
लहरें अकेली रात अकेली है, और मैं !
तुम हो भी, और नहीं भी हो— इतने हसीन हो :
यह कितनी प्यारी रात अकेली है, और मैं !
मेरी तमाम रात का सरमाया एक शमअ
ख़ामोश, बेसबात, अकेली है— और मैं !
‘शमशेर’ किस को ढूँढ़ रहे हो हयात में
बेजान-सी इयात अकेली है, और मैं !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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