तमन्ना के दाग़ धो देते!

कभी तो यूँ भी उमँडते सरिश्क-ए-ग़म ‘मजरूह’,
कि मेरे ज़ख़्म-ए-तमन्ना के दाग़ धो देते|

मजरूह सुल्तानपुरी

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