कहाँ है बू-ए-वफ़ा!

वो कौन है जो नहीं अपनी मस्लहत का ग़ुलाम,
कहाँ है बू-ए-वफ़ा अब वफ़ा के बंदों में|

क़ैसर शमीम

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