लबरेज़ आब-ए-नूर!

है नाज़-ए-हुस्न से जो फ़रोज़ाँ जबीन-ए-यार,
लबरेज़ आब-ए-नूर है चाह-ए-ज़क़न तमाम|

हसरत मोहानी

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