ज़ाग़ ओ ज़ग़न तमाम!

समझे हैं अहल-ए-शर्क़ को शायद क़रीब-ए-मर्ग,
मग़रिब के यूँ हैं जम्अ’ ये ज़ाग़ ओ ज़ग़न तमाम|

हसरत मोहानी

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