आज मैं श्रेष्ठ व्यंग्यकार और हिंदी कवि स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।
त्यागी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की यह कविता –

फाँसी पर टंग गया आकाश
समुद्र अपने ही भँवर में डूब गया
खाइयों में से निकलकर सहसा
वे सब मारने लगे उन्हें
जिन्हें वे जानते तक नहीं थे
पहिले मरा संगीत
फिर मरे, प्रेम, यौवन और रूप
दक्षिण दिशा को घोड़ा फेंकता राजकुमार
और इसके बाद मर गए वे,
सब के सब ख़ुद भी
तोपों के क़ब्रिस्तान में
दफ़्न हो गया बारूद का बूढ़ा जादूगर
वे सब के सब किसलिए मरे थे
इसका पता उन्हें कभी नहीं लगा।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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