काया में परछाई जैसे!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी गीतकार स्वर्गीय राजेंद्र राजन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ।

राजन जी की अधिक रचना मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राजेंद्र राजन जी का यह गीत  –


मौसम में पुरवाई जैसे
सूरज में गरमाई जैसे
ढकी-छुपी सी तुम हो मुझमें
काया में परछाई जैसे

नदिया को सागर का जैसे
शब्दहीन उल्लास पुकारे
किसी यौवना के पल-पल में
उम्र, सखी-सी केश सँवारे

 
बचपन में तरुणाई जैसे
होली में भौजाई जैसे
ढकी-छुपी सी तुम हो मुझमें
काया में परछाई जैसे

मन आवारा निश्छल जैसे
सुख-दुख में कुछ भेद न माने
वो सबको ही अपना समझे
भले-बुरे को क्या पहचाने

कपटी मन चतुराई जैसे
सागर में गहराई जैसे
ढकी-छुपी सी तुम हो मुझमें
काया में परछाई जैसे


मन का पंछी दिशाहीन हो
और गगन हँसता हो उस पर
कहाँ ठिकाना उसे मिलेगा
वृक्ष नही उगते हैं नभ पर

शून्य सदन तन्हाई जैसे
तुलसी में चौपाई जैसे
ढकी-छुपी सी तुम हो मुझमें
काया में परछाई जैसे ।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

                                     ********

2 responses to “काया में परछाई जैसे!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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