दामन-ए-दर्द को!

दामन-ए-दर्द को गुलज़ार बना रक्खा है,
आओ इक दिन दिल-ए-पुर-ख़ूँ का हुनर तो देखो|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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