आज मैं अपने एक मित्र और हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय नवीन सागर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
नवीन जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नवीन सागर जी की यह कविता –

एक बच्ची
अपनी गुदगुदी हथेली
देखती है
और धरती पर मारती है
लार और हँसी से सना
उसका चेहरा
अभी इतना मुलायम है
कि पूरी धरती
थूक के फुग्गे में उतारे है।
अभी सारे मकान
काग़ज़ की तरह हल्के
हवा में हिलते हैं।
आकाश अभी विरल है दूर
उसके बालों को
धीरे-धीरे हिलाती हवा
फूलों का तमाशा है
वे हँसते हुए
इशारे करते हैं:
दूर-दूरान्तरों से
उत्सुक काफ़िले
धूप में चमकते हुए आएँगे।
सुंदरता!
कितना बड़ा कारण है
हम बचेंगे अगर!
जन्म चाहिए
हर चीज़ को एक और
जन्म चाहिए।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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