आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि श्री नंद भारद्वाज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
नंद जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नंद भारद्वाज जी की यह कविता –

कहवाघरों की सर्द बहसों में
अपने को खोने से बेहतर है
घर में बीमार बीबी के पास बैठो,
आईने के सामने खड़े होकर
उलझे बालों को सँवारो –
अपने को आँको,
थके-हारे पड़ौसी को लतीफ़ा सुनाओ
बच्चों के साथ साँप-सीढ़ी खेलो –
बेफ़िक्र फिर जीतो चाहे हारो,
कहने का मकसद ये कि
खुद को यों अकारथ मत मारो !
ज़रूरी नहीं
कि जायका बदलने के लिए
मौसम पर बात की जाए
खंख क़िताबों पर ही नहीं
चौतरफ़ दिलो-दिमाग पर
अपना असर कर चुकी है –
खिड़की के पल्ले खोलो
और ताज़ा हवा लेते हुए
कोलाहल के बीच
उस आवाज़ की पहचान करो
जिसमें धड़कन है ।
आँख भर देखो उस उलझी बस्ती को
उकताहट में व्यर्थ मत चीख़ो,
बेहतर होगा –
अगर चरस और चूल्हे के
धुँए में फ़र्क करना सीखो !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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