सुस्त था मंज़र!

बहुत ही सुस्त था मंज़र लहू के रंग लाने का,
निशाँ आख़िर हुआ ये सुर्ख़-तर आहिस्ता आहिस्ता|

मुनीर नियाज़ी

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