मिरे बाहर फ़सीलें थीं!

मिरे बाहर फ़सीलें थीं गुबार-ए-ख़ाक-ओ-बाराँ की,
मिली मुझ को तिरे ग़म की ख़बर आहिस्ता आहिस्ता|

मुनीर नियाज़ी

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