बू-ए-गुल ठहरी न!

दस्त-ए-सय्याद भी आजिज़ है कफ़-ए-गुल-चीं भी,
बू-ए-गुल ठहरी न बुलबुल की ज़बाँ ठहरी है|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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