दिल से निकली है तो!

बिखरी इक बार तो हाथ आई है कब मौज-ए-शमीम,
दिल से निकली है तो कब लब पे फ़ुग़ाँ ठहरी है|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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