लीजिए आज बार फिर से प्रस्तुत है अपने जमाने में काव्य मंचों के एक प्रमुख नाम रहे स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी की एक कविता| सरोज जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी की यह कविता –

सचमुच बहुत देर तक सोए
इधर यहाँ से उधर वहाँ तक
धूप चढ़ गई कहाँ-कहाँ तक
लोगों ने सींची फुलवारी
तुमने अब तक बीज न बोए ।
दुनिया जगा-जगा कर हारी,
ऐसी कैसी नींद तुम्हारी ?
लोगों की भर चुकी उड़ानें
तुमने सब संकल्प डुबोए ।
जिन को कल की फ़िक्र नहीं है
उनका आगे ज़िक्र नहीं है,
लोगों के इतिहास बन गए
तुमने सब सम्बोधन खोए ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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