छींटे देख लेता हूँ!

छुपाते हैं बहुत वो गर्मी-ए-दिल को मगर मैं भी,

गुल-ए-रुख़ पर उड़ी रंगत के छींटे देख लेता हूँ|

मुनीर नियाज़ी

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