और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं!

वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़िया-गरी*,
फ़ज़ा में और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं|

Speaking in style
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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