मुझे ताज-ओ-तख़्त ख़ुदा न दे!

मैं ग़ज़ल की शबनमी आँख से ये दुखों के फूल चुना करूँ,
मिरी सल्तनत मिरा फ़न रहे मुझे ताज-ओ-तख़्त ख़ुदा न दे|

बशीर बद्र

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