काएनात बन के उभरने लगा हूँ मैं!

ये मेहर-ओ-माह अर्ज़-ओ-समा मुझ में खो गए,
इक काएनात बन के उभरने लगा हूँ मैं|

जाँ निसार अख़्तर

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