क्यूँ सुक़रात बनो ख़ामोश रहो!

सच अच्छा पर उसके जिलौ में ज़हर का है इक प्याला भी,
पागल हो क्यूँ नाहक़ को सुक़रात बनो ख़ामोश रहो|

इब्न ए इंशा

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