ज़ख़्मों को दुआ दी जाए!

इन्हीं गुल-रंग दरीचों से सहर झाँकेगी,
क्यूँ न खिलते हुए ज़ख़्मों को दुआ दी जाए|

जाँ निसार अख़्तर

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