हिज्र की रात ढल गई!

बज़्म-ए-ख़याल में तिरे हुस्न की शम्अ जल गई,
दर्द का चाँद बुझ गया हिज्र की रात ढल गई|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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