
कब महकेगी फ़स्ल-ए-गुल कब बहकेगा मय-ख़ाना,
कब सुब्ह-ए-सुख़न होगी कब शाम-ए-नज़र होगी|
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
A sky full of cotton beads like clouds

कब महकेगी फ़स्ल-ए-गुल कब बहकेगा मय-ख़ाना,
कब सुब्ह-ए-सुख़न होगी कब शाम-ए-नज़र होगी|
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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