आज एक बार फिर मैं देश में हिन्दी के एक वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चक्रधर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता, जिसमें पचास वर्ष के व्यक्ति को एक अलग नजरिए से दर्शाया गया है –

पचास साल का इंसान
न बूढ़ा होता है न जवान
न वो बच्चा होता है
न बच्चों की तरह
कच्चा होता है।
वो पके फलों से लदा
एक पेड़ होता है,
आधी उम्र पार करने के कारण
अधेड़ होता है।
पचास साल का इंसान
चुका हुआ नहीं होता
जो उसे करना है
कर चुका होता है,
जवानों से मीठी ईर्ष्या करता है
सद्भावना में फुका होता है
शामिल नहीं होता है
बूढ़ों की जमात में,
बिदक जाता है
ज़रा सी बात में।
बच्चे उससे कतराते हैं
जवान सुरक्षित दूरी अपनाते हैं,
बूढ़े उसके मामलों में
अपना पांव नहीं फंसाते हैं।
क्योंकि वो वैल कैलकुलेटैड
कल्टीवेटैड
पूर्वनियोजित और बार बार संशोधित
पंगे लेता है,
अपने पकाए फल,
अपनी माया, अपनी छाया
आसानी से नहीं देता है।
वो बरगद नहीं होता
बल्कि अगस्त महीने का
मस्त लेकिन पस्त
आम का पेड़ होता है,
जी हां, पचास का इंसान अधेड़ होता है।
यही वह उमर है जब
जब कभी कभी अंदर
बहुत अंदर कुछ क्रैक होता है,
हिम्मत न रखे तो
पहला हार्ट-अटैक होता है।
झटके झेल जाता है,
ज़िन्दगी को खेल जाता है।
क्योंकि उसके सामने
उसी का बनाया हुआ
घौंसला होता है,
इसीलिए जीने का हौसला होता है।
बौड़म जी बोले-
पचास का इंसान
चुलबुले बुलबुलों का एक बबाल है,
पचास की उमर
उमर नहीं है
ट्रांज़ीशन पीरियड है
संक्रमण काल है।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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