ग़म होता न जीने का मज़ा होता!

अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता,
न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता|

चकबस्त बृज नारायण

Leave a comment