ताज़ा ग़ज़ल और भी कह लूँ!

मुमकिन हो तो इक ताज़ा ग़ज़ल और भी कह लूँ,
फिर ओढ़ न लें ख़्वाब की चादर तिरी आँखें|

मोहसिन नक़वी

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