आज एक बार मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि, वरिष्ठ गीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं, आज का यह नवगीत भी कुछ अलग किस्म का है|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –

राजमिस्त्री से हुई क्या चूक, गारे में
बीज को संबल मिला रजकण तथा जल का ।
तोड़कर पहरे कड़े पाबन्दियों के आज
उग गया है एक नन्हा गाछ पीपल का ।
चाय की दो पत्तियोंवाली
फुनगियों ने पुकारा
शैल-उर से फूटकर उमड़ी
दमित-सी स्नेह-धारा ।
एक छोटी-सी जुही की कली
मेरे हाथ आई
और पूरी देह, आदम
ख़ुशबुओं से महमहाई ।
वनपलाशी आग के झरने नहाकर हम
इस तरह भीगे कि ख़ुद जी हो गया हलका ।
मूक थे दोनों, मुखर थी
देह की भाषा
कर गया जादू ज़ुबां पर
गोगिया पाशा
लाख आँखें हों मुँदी —
सपने खुले बाँटे
वह समर्पण फूल का
ऐसा, झुके काँटे
क्या हुआ जो धूप में तपता रहा सदियों
ग्रीष्म पर भारी पड़ा ऋतुराज इक पल का ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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