टूटते कगार से!

आज एक बार फिर से मैं, अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

चाँदनी रात हुई जब झील
झाँकने लगी अनमनी प्रीत
गीत के टूटे-फूटे शंख
लहरियों में अँगड़ाने लगे
याद बीते दिन आने लगे

धुएँ-सी उठी गुनगुनी लहर
छोड़ अपनी ठण्डी तासीर
मचलने लगा अधर पर नाम
भर गई आँखों में तस्वीर
देह के छुए-अनछुए तार तुम्हारे स्वर में गाने लगे

झुके से कमलानन के पास
गूँजने लगे मधुर अनुबन्ध
किनारे पर आ बैठे मौन
अधजुड़ी छाँहों के सम्बन्ध
चम्पई मौसम के संकेत बुझे शोले दहकाने लगे


मिली अमृत की स्वीकृति हँसी
और फिर ज़हरीला इनकार
मान के बान प्रान को मिले
कामना को नखरीला प्यार
तभी कंगन के बोल अमोल न जाने क्या समझाने लगे ?


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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