कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है!

है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है,
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है|

बशीर बद्र

Leave a comment