तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है!

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है,
दुश्नाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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