देखी थी कोई बरसात कहाँ!

मेरी आबला-पाई* उनमें याद अक्सर की जाती है,
काँटों ने इक मुद्दत से देखी थी कोई बरसात कहाँ|

*पैर के छाले

राही मासूम रज़ा

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