आज मैं एक बार फिर हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बुदधिनाथ मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत–

स्तब्ध हैं कोयल कि उनके स्वर
जन्मना कलरव नहीं होंगे ।
वक़्त अपना या पराया हो
शब्द ये उत्सव नहीं होंगे ।
गले लिपटा अधमरा यह साँप
नाम जिस पर है लिखा गणतंत्र
ढो सकेगा कब तलक यह देश
जबकि सब हैं सर्वतंत्र स्वतंत्र
इस अवध के भाग्य में राजा
अब कभी राघव नहीं होंगे ।
यह महाभारत अजब-सा है
कौरवों से लड़ रहे कौरव
द्रौपदी की खुली वेणी की
छाँह में छिप सो रहे पांडव
ब्रज वही है, द्वारका भी है
किन्तु अब केशव नहीं होंगे ।
जीतकर हारा हुआ यह देश
मांगता ले हाथ तम्बूरा
सुनो जनमेजय, तुम्हारा यज्ञ
नाग का शायद न हो पूरा
कोख में फिर धरा-पुत्री के
क्या कभी लव-कुश नहीं होंगे ?
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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