बाग़ में कोई ज़रूर था!

निकला जो चाँद आई महक तेज़ सी ‘मुनीर’,
मेरे सिवा भी बाग़ में कोई ज़रूर था|

मुनीर नियाज़ी

3 responses to “बाग़ में कोई ज़रूर था!”

  1. बहुत सुंदर

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      हार्दिक धन्यवाद जी।

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