
तिश्नगी के भी मक़ामात हैं क्या क्या यानी,
कभी दरिया नहीं काफ़ी कभी क़तरा है बहुत|
कृष्ण बिहारी ‘नूर’
A sky full of cotton beads like clouds

तिश्नगी के भी मक़ामात हैं क्या क्या यानी,
कभी दरिया नहीं काफ़ी कभी क़तरा है बहुत|
कृष्ण बिहारी ‘नूर’
Leave a comment