तेरी चश्म-ए-इनायत कहाँ कहाँ!

अब इम्तियाज़-ए-इश्क़-ओ-हवस भी नहीं रहा,
होती है तेरी चश्म-ए-इनायत कहाँ कहाँ|

फ़िराक़ गोरखपुरी

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