कड़वे आचमन के बाद!

आज एक बार फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में भी काफी कुछ लिखा है, इसलिए आज सीधे उनका यह सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ|

आज कड़वे आचमन के बाद
वंशी को समर्पित हैं–
भरी आँखें, सहमते गीत
भारी मन

ये हमारी मुक्त चंद्रा -घटियाँ हैं
प्यार का संवाद इनमें साँस लेगा
सभ्यता के द्वार महकी रोशनी को
एक अनहदनाद फिर विस्तार देगा
खोल देंगे सप्तकों की गाँठ
पीली सरगमों के आँचलों में
बाँध देंगे हम हरे गुंजन


रच रही जो राग संजीवन हमारा
मातमो से घिर गई शहनाइयाँ वे
कर रही शृंगार मीठे स्वप्न से जो
धन्य हैं संसार की अगनाईयाँ वे
सौंप देंगे हम समय को आज
अपने गुनगुनाते आँसुओ से
धुले दर्पण, फागुनी चितवन

फिर हमारी ही प्रतीक्षा में कहीं पर
अनमने श्यामल गुलाबों के नयन हैं
फूटने को हैं कहीं अंकुर नुकीले
पत्तियों के अनसुने रेशम -वचन हैं
बाँट देंगे हम अनन्त वसंत
अपना बस यही धन है
हमारा बस यही है मन
यही है प्रन
आज कड़वे आचमन के बाद|

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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