ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं!

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं,
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बा’द|

कैफ़ी आज़मी

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