बहुत दिनों से फिल्मों से जुड़ी कोई रचना मैंने शेयर नहीं की है, केवल अन्य साहित्यिक रचनाएं शेयर करता रहा हूँ| आज से सोचता हूँ कि कुछ दिन फिल्मों से जुड़ी कुछ रचनाएं शेयर करूंगा| आज शेयर कर रहा हूँ साहिर लुधियानवी जी के लिखे एक फिल्मी गीत से, जो पुरानी फिल्म- ‘लैला मजनू’ में फिल्माया गया था, और मोहम्मद रफी साहब ने इस गीत को गाया था|
लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल-

अब अगर हमसे ख़ुदाई भी खफ़ा हो जाए
गैर-मुमकिन है कि दिल दिल से जुदा हो जाए
जिस्म मिट जाए कि अब जान फ़ना हो जाए
गैर-मुमकिन है…
जिस घड़ी मुझको पुकारेंगी तुम्हारी बाँहें
रोक पाएँगी न सहरा की सुलगती राहें
चाहे हर साँस झुलसने की सज़ा हो जाए
गैर-मुमकिन है…
लाख ज़ंजीरों में जकड़ें ये ज़माने वाले
तोड़ कर बन्द निकल आएँगे आने वाले
शर्त इतनी है कि तू जलवा-नुमाँ हो जाए
गैर-मुमकिन है…
ज़लज़ले आएँ गरज़दार घटाएँ घेरें
खंदकें राह में हों तेज़ हवाएँ घेरें
चाहे दुनिया में क़यामत ही बपा हो जाए
गैर-मुमकिन है…
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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