मैं कभी न गर्द-ओ-ग़ुबार लूँ!

कहीं और बाँट दे शोहरतें कहीं और बख़्श दे इज़्ज़तें,
मिरे पास है मिरा आईना मैं कभी न गर्द-ओ-ग़ुबार लूँ|

बशीर बद्र

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