तितली!

आज सोचा था कि अपने अग्रज और गुरु तुल्य स्वर्गीय डॉक्टर कुंअर बेचैन जी का एक गीत शेयर करूंगा, उनके बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं| लेकिन आज मेरी निगाह पड़ी कुंअर रवींद्र जी की एक रचना पर, सोचा आज इस रचना को ही शेयर कर लेता हूँ| कुंअर रवींद्र जी मुख्य रूप से एक चित्रकार हैं और चित्रकार वाला यह गुण उनकी इस कविता में भी परिलक्षित होता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है कुंअर रवींद्र जी की यह कविता–

मेरे हाथों से छूट कर
दूर उड़ गयी थी वह तितली
मगर अब तक
उसके पंखों के नीले,सुनहरे काले रंग
मेरी उँगलियों में चिपके हुए हैं

मै रोज़ ताकता हूँ उन्हें
और उस बाग़ीचे को
यादों में ढूँढ़ता रहता हूँ
जहाँ मैंने उसे पकड़ा था
चुपके से
रातरानी की झाड़ी के पास
लुका-छिपी खेलते हुए

तब मै पूरा का पूरा
मीठी ख़ुशबू से भर गया था
लिसलिसा-सा गया था मै
मेरी उँगलियाँ भी

उसके पंखों का रंग लिए
आज भी कभी-कभी
लिसलिसा जाता हूँ मै
ख़ुशबू से भर जाता हूँ मै
आज भी


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

4 responses to “तितली!”

  1. आखिर की पंक्तियों का तो क्या ही कहना

    Like

    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      जी, हार्दिक धन्यवाद।

      Like

  2. बहुत सुंदर।

    Like

    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      हार्दिक धन्यवाद जी।

      Like

Leave a comment