आज फिर मैं एक वरिष्ठ कवि एवं नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| किसी समय मैं हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की झारखंड स्थित मुसाबनी माइंस में हिन्दी अधिकारी था और बुदधिनाथ जी हमारे कलकत्ता स्थित मुख्यालय में हिन्दी विभाग में उच्च पद पर थे, इस प्रकार कई बार उनके सानिध्य का और उनके संचालन में काव्य-पाठ का भी अवसर मिला|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह सुंदर नवगीत–

सड़कों पर शीशे की किरचें हैं
औ’ नंगे पाँव हमें चलना है ।
सरकस के बाघ की तरह हमको
लपटों के बीच से निकलना है ।
इतने बादल, नदियाँ, सागर हैं
फिर भी हम हैं रीते के रीते
चूमते हुए छुरी कसाई की
मेमने सरीखे ये दिन बीते
फिर लहूलुहान उम्र पूछेगी
जीवन क्या नींद में टहलना है ?
सूर्य लगे अब डूबा, तब डूबा
औ’ ज़मीन लगती है धँसती-सी
भोर : हिंस्र पशुओं की लाल आँखें
सांझ : बेगुनाह जली बस्ती-सी
मेघों से टकराते महलों की
छाँहों में और अभी जलना है ।
मन के सारे रिश्ते पल भर में
बासी क्यों होते अख़बारों-से ?
पूजा के हाथ यहाँ छू जाते
क्यों बिजली के नंगे तारों से ?
जीने के लिए हमें इस उलटी
साँसों के दौर को बदलना है ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a comment